यात्रा

मेरे सपनों..संघर्षों...बिखराव-टूटन व जुडने की अनवरत यात्रा..एक अनजाने , अनदेखे क्षितिज की ओर ।

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एल.एस. बिष्ट्


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हिमालय के एक लेखक की दुनिया

Posted On: 18 May, 2017  
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आस्था के सवाल पर सख्त नीतियों की दरकार

Posted On: 12 Apr, 2017  
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Social Issues में

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कहां खो गई वह पहली तारीख

Posted On: 27 Feb, 2017  
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जीवन में बहने वाला संगीत है बसंत

Posted On: 9 Feb, 2017  
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जीवन में बहने वाला संगीत है बसंत

Posted On: 9 Feb, 2017  
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संकट मे है बच्चों की दुनिया

Posted On: 27 Dec, 2016  
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Junction Forum Others social issues में

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चकाचौंध मे खोता त्योहार

Posted On: 25 Oct, 2016  
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Religious Social Issues मेट्रो लाइफ में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

सही बात है कि धर्मगुरुओं और मुसलिम लॉ बोर्ड से जुड़े लोगों को अपना अस्तित्व खतरे में लग रहा है और राजनेताओं को सत्ता हथियाने के लिए कुछ भी करने में गुरेज़ नहीं है I दोनों में से किसी को भी सामाजिक सुधार में दिलचस्पी नहीं है I पदासीन राजनेताओं को मतदाता को जवाब देने के लिए कुछ न कुछ कार्य करना पड़ता है और अपने किये हुए कार्यों का ढोल पीटने से वोह भी नहीं बच सकते क्योंकि सत्ता छूटने का डर सताता रहता है Iभारत के  लोकतंत्र में सामाजिक अव्यवस्थाओं का बोलबाला बढ़ रहा है I बहुत सारी बिगड़ी हुयी व्यवस्थाएं बहुसंख्यक समाज में भी हैं या पनप रही हैं I उदाहरण के लिए मध्यम वर्ग में बढ़ते तलाक I सादर अभिवादन सहित अतुल

के द्वारा: atul61 atul61

आदरणीय बिष्ट जी । बहुत-बहुत बधाई हो आपको साप्ताहिक सम्मान के लिए । आपका लेख सामयिक है और इसमें निहित विचारों से असहमत होने की कोई गुंजाइश नहीं । लेकिन बिष्ट जी, अब हालात वो नहीं रहे जो दशकों तक रहे हैं । अब मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति करने वाले दल भी इस मुद्दे पर कठमुल्लों का साथ देने से परहेज़ कर रहे हैं जो किसी भी लिहाज़ से भारतीय मुस्लिम समाज के हितों का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं । मुस्लिम महिलाएं स्वयं जागरूक होकर अपने हितों के संवर्धन के लिए उठ खड़ी हुई हैं । अब यह शोर वे ही लोग मचा रहे हैं जिनको अपना अस्तित्व तथा अपनी प्रासंगिकता संकट में दिखाई पड़ रही है । सामान्य मुस्लिम समाज के अधिसंख्य पुरुष भी अब महिलाओं को उनका उचित अधिकार देना चाहते हैं तथा घर तोड़ने वाली एवं महिलाओं के साथ अन्याय करने वाली प्रथाओं का समर्थन नहीं करते हैं ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

के द्वारा: एल.एस. बिष्ट् एल.एस. बिष्ट्

पाकिस्तानी शासन, सेना और हिंसक उग्रवादी चाहे हमारी उदारता को हमारी दुर्बलता समझें लेकिन वस्तुतः हमारी उदारता भी हमारी शक्ति ही है जिसका दीर्घकालिक प्रभाव सम्पूर्ण विश्व में हमारे आदर के रूप में सामने आया है । विश्व में जो सम्मान भारत को प्राप्त है, उसका अंशमात्र भी पाकिस्तान को कभी प्राप्त होने वाला नहीं है । सर्जिकल स्ट्राइक्स समय-समय पर होती रहनी चाहिए चाहे उनकी सार्वजनिक घोषणा की जाए या नहीं । इसके अतिरिक्त हमारी सतर्कता व्यवस्था को भली-भाँति सुधारा जाना चाहिए ताकि जिस तरह से समय-समय पर आकस्मिक आक्रमणों से हमारे सैनिकों एवं नागरिकों के जन-धन की हानि होती है, वह न हो । पाकिस्तान के साथ शठे शाठ्यम समाचारेत की नीति को अपनाना ही श्रेयस्कर है । आपका लेख समीचीन एवं सार्थक है आदरणीय बिष्ट साहब ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

जय श्री राम आदरणीय विष्ट जी आज भी उरी में मुत्भेद में सेना ने १० आतंकवादियो को मार दिया.सेना ने पहले भी बहुत तबाही मची जो पकिस्तान समाचारों में आती.दुर्भग्य देश का की हमारे सेकुलर नेता जो मुस्लिम वोटो की वजह से कुछ भी कर सकते जिस तरह शरद यादव और येचुरी अलगाव वड़ो से घर में मिलने गए और बेईज्ज़ती करवाई उसके बाद भी उनसे बात करने की और १९४८ की स्थित से बात करने की बात करते.टीवी में एक मुस्लिम नेता खुले आम कहते की सेना के लोग मैडल के लिए लोगो को मारते और बतला हाउस मुठभेड़ फर्जी थी और इशरत जहाँ आतंकवादी नहीं थी आप ऐसे लोगो से क्या कर सकते.सरकार क्या कार्यवाही करेगी ये टीवी में नहीं बताया जा सकता बस कुछ दिन सब्र कीजीये.हमारे देश में आतंकवादियो की पैरवी करने वाले भी मिल जाते.सुन्दर भावना और चिंता भरे लेख के लिए धन्यवाद्.

के द्वारा: rameshagarwal rameshagarwal

के द्वारा: एल.एस. बिष्ट् एल.एस. बिष्ट्

आपके विचार कुल-मिलकर ठीक हैं आदरणीय बिष्ट जी लेकिन अपूर्ण हैं । किसी भी आंदोलन या सत्याग्रह के संदर्भ में सर्वाधिक महत्वपूर्ण उसके पीछे स्थित भावना होती है न कि उसे मिलने वाला जनसमर्थन या उसके प्रति सरकारी रवैया । शर्मिला ने जिस भावना के साथ अपना सत्याग्रह सोलह लंबे वर्षों तक चलाया, वह भावना स्तुत्य है । सरकारी उदासीनता तो सामान्य बात है । सरकारें तो चाहे वे किसी भी दल की हों, हिंसा के आगे ही घुटने टेकती हैं और शांतिपूर्ण आंदोलन की ओर से आँखें मूँद लेती हैं । लुटेरे, दुराचारी तथा हत्यारे जाट आंदोलनकारियों की आरक्षण की अनुचित माँग को जब नाक रगड़कर माना जा सकता है तो क्या शर्मिला से बातचीत भी नहीं की जा सकती थी और उसकी तथा उसके जैसे पूर्वोत्तर के नागरिकों की पीड़ा को समझने का प्रयास भी नहीं किया जा सकता था ? रही बात जनसमर्थन की तो जिस क्षेत्र में वह रहती है और जहाँ की जनता ने कानून के नाम पर की गई ज़्यादतियों को भुगता है, वहाँ तो उसे समर्थन है ही । दिल्ली और अन्य सुदूर भारतीय क्षेत्रों के लोग पूर्वोत्तर के वासियों की पीड़ा को वैसे भी नहीं समझते । पूर्वोत्तर के वासियों के प्रति अन्य भारतीय क्षेत्रों के पूर्वाग्रहपूर्ण दृष्टिकोण के उदाहरण तो आए दिन सामने आते रहते हैं । ऐसे में शर्मिला का सोलह वर्षों का मैराथन अनशन चाहे प्रत्यक्षतः निष्फल ही रहा हो, न्याय के लिए संघर्ष करने वाले सभी आहत लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है एवं रहेगा । कानून चाहे न हटाया जाए लेकिन उसके दुरुपयोग पर तो ध्यान दिया जाना चाहिए तथा यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उसकी आड़ में निर्दोषों पर अत्याचार न हों । और शर्मिला जैसे पीड़ितों के घाव पर मरहम भी लगाया जाना चाहिए । कानून की व्यावहारिक आवश्यकता तथा देश की सुरक्षा के नाम पर सरकारें निर्दोष नागरिकों की पीड़ा तथा उनके शांतिपूर्ण सत्याग्रह को अनदेखा करें तथा हाथ-पे-हाथ धरकर बैठी रहें, यह तो किसी भी जनकल्याणकारी राज्य का लक्षण नहीं हो सकता ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

के द्वारा: jlsingh jlsingh

श्री बिष्टजी नमस्कार ! केरल पर लेटेस्ट और वस्तृत जानकारी के लिए धन्यवाद ! केरल शुरू से ही सामयवाद और ईसायत के प्रभाव से ग्रहसित है ! पहली बार भाजपा ने वहां आर यस यस के जरिए वहां के हिन्दुओं को जगाकर उन्हें अपने अधिकार और कर्तव्यों के प्रति अवगत कराने का प्रयास किया नतीजा सबके सामने है ! राहुल, केजरीवाल, नीतीशकुमार, लालू, मायावती सारे मुस्लिम, ईसाइयों और निम्न वर्ग के वोट बैंक बनाने की राजनीती कर रहे हैं, और ये सारे जीतते हिन्दुओं के वोटों से ही हैं ! हिन्दू को कोइ कम्युनिष्ट मुसलमान, ईसाई मारे ये सारे चुप्पी साध लेते हैं, एक अल्पसंख्य्क और ओबीसी वाला मरता है फांसी लगाकर भी तब भी जलजला आजाता है !

के द्वारा: harirawat harirawat

श्री बिष्ट जी हम लोग ज्यादातर दिल्ली यूपी बिहार राजस्थान की खबरों तक ही सीमित रह जाते हैं आपने केरल में कांग्रेस की सरकार के स्थान पर सामयवादी सरकार पर प्रकाश डाला सामयवादी जैसे ही सत्ता में आते हैं अपना वर्चस्व जमाने की कोशिश करते हैं कांग्रेस को उसके घोटाले खा गये एक मजबूत विपक्ष का भी अभाव सा होता जा रहा है केवल शोर मचाने वाला विपक्ष रह गया है भाजपा और साम्यवादियों का पुराना वैर रहा है | आपका लेख में सबसे बाद में इत्मिनान से पढ़ती हूँ क्योकि सही जानकारी अच्छी जानकारी आपके लेख से मिल जाती है फिर और कुछ पढने की जरूरत ही नहीं रहती में बोलबोल कर जब समझ -समझ कर पढ़ती हूँ मेरे पति हंसते हैं अब तुम केरला पर पसारी बनने वाली हो

के द्वारा: Shobha Shobha

"कभी कोई छात्र नौकरी न मिल पाने के कारण फ़ांसी से लटक जाता है तो कभी कोई युवती अपने असफ़ल प्रेम के कारण अपने हाथों की नस काट लेती है | कहीं कोई कर्ज मे डूब कर किसी अपार्टमेंट से नीचे कूद पडता है तो कोई रेल की पटरियों के बीच लेट कर अपनी जीवन लीला समाप्त कर देता है | गहरे अवसाद मे डूबे और फ़िर मौत को गले लगाते ऐसे लोगों की संख्या साल-दर-साल बढती जा रही है |" आदरणीय विष्ट जी ! बिलकुल सही कहा है आपने ! बहुत अच्छा लेख ! अब जीवन में नीरसता बढ़ती जा रही है ! जिनकी लिखने पढ़ने में रूचि है, वो तो उसे ही मित्र बना लेते हैं, पर बाकी लोग क्या करें ? निश्चय ही इस पर गहरे मंथन की जरुरत है ! अच्छी प्रस्तुति हेतु सादर आभार !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

बहरहाल कोई संदेह नही कि अंधेरा गहराता जा रहा है और इसका कोई कारगर हल निकलता भी नही दिखाई दे रहा । लेकिन इतना अवश्य है कि लोकतंत्र मे जनता का आक्रोश व विरोध सबकुछ बदलने की सामर्थ्य रखता है । इस गुस्से को ही हथियार बनाना होगा और तभी राजनेताओं, नौकरशाहों व पूंजीपतियों के बीच बने अपवित्र रिश्तों पर प्रभावी चोट की जा सकेगी । यह नही भूलना चाहिए कि लोकतंत्र मे वह व्यवस्था कायम नही रह सकती जिसे जनता न चाहे। आदरणीय बिष्ट साहब, सादर अभिवादन! आपने भ्रष्टाचार का इतिहास ही बता दिया. अब आपका कहना है की हल जनता के पास है, जनता बीच बीच में सरकारें बदलती रही है, नतीजा? सिस्टम इतना साद चूका है की बदलना बहुत ही मुश्किल का काम है. प्रधान मंत्री श्री मोदी के कार्यकाल में अभी तक किसी को सजा नहीं हुई. हो-हल्ला ही मचता रहा है. दो साल में ढिंढोरे अवश्य पीटे गए. जब तक सजा नहीं मिलती समधन मुश्किल है मेरी राय में. जन लोकपाल का क्या हुआ? मुख्य न्यायाधीश की आँखों में आंसू? क्यों? हम सबको अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर सोचना होगा और सम्पूर्ण जागरण को हथियार बनाना होगा. जब तक हम सभी में सम्पूर्ण चेतन नहीं आएगी भ्रष्टाचार नहीं रुकेगा. बड़े भ्रष्टाचारों के चरचएं खूब होती है सजा नहीं होती. माल्या का क्या करेंगे? ९००० करोड़ वापस मिलेगा? लालू बाहर क्यों हैं. उनसे वसूली की जाएगी? मोदी जी अभी सत्ता में हैं, क्या पता इनके जाने के बाद इनके समय का भी भ्रष्टाचार उजागर हो? परिस्थितियां ज्यादा नहीं बदली है अभी भी सब कुछ वैसा ही है. जमाखोरों पर कार्रवाई हो रही है क्या? फिर महंगाई बढ़ती ही जा रही है क्यों? चुनावों खर्च करने को कौन धन मुहैया करता है? कोई भी योजना का शुभारम्भ में जो ढोल बजाये जाते हैं उनके लिए संसाधन कौन जुटाता है? आज भी अप्रडों का बोलबाला काम हुआ है क्या? महिला उत्पीड़न घटा है क्या? सवाल बहुत है जवाब????

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: rameshagarwal rameshagarwal

के द्वारा: एल.एस. बिष्ट् एल.एस. बिष्ट्

सिंह साहब बधाई हेतु हार्दिक धन्यावाद । आप मित्रों की शुभकामनाएं हैं । प्रयास रहता है कि कुछ सार्थक लिखा जाता रहे । कहीं कुछ प्रभाव तो पडता ही है । हम आप लिख ही सकते हैं । छात्र राजनीति पर कमेंट मे आपने बहुत गहनता से विश्लेषण किया है । बिल्कुल सही रेखांकित किया है आपने यही छात्र राजनीति कई राजनीतिक बद्लावों की गवाह बनी है और देश के कई अच्छे राजनेता भी यही से निकले हैं । बस अब यह अपना वह चरित्र खोने लगी है और बेकार के कामों मे अपनी उर्जा को नष्ट कर रही है । राजनीति के दुषित माहौल का प्रभाव यहां पडना भी लाजिमी है । परिसर राजनीति को दलगत राजनीति की बुराईयों से मुक्त रखे जाने की जरूरत है ।

के द्वारा: एल.एस. बिष्ट् एल.एस. बिष्ट्

आपने सार्वजनिक संपत्ति को ग़रीब की जोरू की उपमा उचित ही दी है बिष्ट जी । सार्वजनिक संपत्ति के साथ किए जाने वाले अनुत्तरदायी व्यवहार और अपनाए जाने वाले हलके दृष्टिकोण को देखकर तो यही लगता है । वस्तुतः सार्वजनिक संपत्ति को हानि पहुँचाना भी देशद्रोह की श्रेणी में ही आता है । विभिन्न आंदोलनों में सार्वजनिक संपत्ति को हानि पहुँचाने वाले स्वयं को राष्ट्र का हितैषी नहीं, शत्रु ही सिद्ध करते हैं । लेकिन इस संदर्भ में लोगों को दिशाज्ञान देने और अनुचित कार्य से रोकने का कष्ट उनके नेता नहीं उठाते । इसके विपरीत वे तो अपने गिरफ़्तार होने वाले चेलों को छुड़ाने की जुगत में लग जाते हैं । और छूट जाने के उपरांत ऐसे लोगों को इस तरह फूलमालाओं से लादा जाता है, इस तरह से कंधों पर उठाया जाता है मानो उन्होंने कोई महान कार्य किया हो । ईश्वर ही रक्षा करे हमारे देश की । मैं आपके सभी विचार-बिन्दुओं से पूर्णरूपेण सहमत हूँ ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

आदरणीय बिष्ट साहब, सर्वप्रथम आपको 'साप्ताहिक सम्मान' के लिए बधाई! अब आते है आपके ब्लॉग के सन्दर्भ में आपने विस्तारपूर्वक छात्र राजनीति की चर्चा की है.आपने जयप्रकाश नारायण के आंदोलन तक का जिक्र किया है. इसी छात्र आंदोलन का परिणाम था कांग्रेस का पतन और राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार का गठन. उसी चरण से उभरे नेता राम विलाश, लालू, नितीश, सुशील मोदी वगैरह है. ये सभी अब अलग अलग अपनी राजनीति की खेती कर रहे हैं.कुछ दिनों तक इनका शासन कभी इधर तो कभी उधर चलता रहा. फिर शुरू हुआ अन्ना का आंदोलन और फिर आया बहुत बड़ा परिवर्तन, जिसने भाजपा को पूर्ण बहुमत दिया और नरेंद्र मोदी को बनाया प्रधान मंत्री . नरेंद्र मोदी से जनता को बड़ी उम्मीदें हैं. पर विपक्ष और उनकी पार्टी के भी अतिवादी लोग बीच बीच में बाधा पहुँचाने का काम कर रहे हैं. मोदी को इन्ही चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. बीच में छात्रों द्वारा राजनीति से दूर रहने की ही नीति अपनाई जाने लगी थी. छात्रों या शालीन लोगों के लिए राजनीति अछूत जैसी हो गयी थी. इसी बीच कुछ नेताओं के बयान आये कि जब तक अच्छे लोग राजनीति में नहीं आएंगे, राजनीति गंदे लोगों का अखाडा बनी रहेगी. अब एक बार पुन: छात्र वर्ग के अंदर नेतागीरी घुंस गयी है. ये जल्द परिणाम चाहने लगे हैं और इसी कारण जल्दी प्रचारित होने के लिए भी कुछ ऊल जलूल हरकत करने लगे हैं. अब आप और हम जरूर देखेंगे कि हार्दिक पटेल, कन्हैया कुमार और रोहित वेमुला के नाम पर कुछ नेता बन जाएंगे और राजनीति में कूद पड़ेंगे. राजनीति मतलब सत्तासुख.अपार दौलत और साम्राज्य.जितना मैं समझता हूँ. बाकी लोग तो रोज कमाने खाने वाले हैं और उनपर टैक्स का कैसा मार पड़ता है वह हम सभी बजटों में देख चुके हैं. प्रतिक्रिया लम्बी हो गयी इसलिए विराम देता हूँ. इसी प्रकार हमलोग अपना विचार बाँटते रहेंगे.सादर.

के द्वारा: jlsingh jlsingh

राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को पहले से ही भाँपकर उन्हें रोका जाए, इस बाबत तो कोई दो राय नहीं हो सकती बिष्ट जी लेकिन यह मामला इतना सीधा-सादा नहीं है, पेचीदा है जिसकी गहराई से पड़ताल होनी चाहिए और केवल सुनीसुनाई बातों या अधकचरी सूचनाओं के आधार पर किसी को काले और किसी को उजले रंग में नहीं रंगा जाना चाहिए । कन्हैया कुमार जिस संगठन से जुड़ा है, उसे वामपंथी संगठनों में सबसे नरम माना जाता है और जिसका राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का कोई रिकॉर्ड नहीं है । स्वयं कन्हैया कुमार का राष्ट्रविरोधी कार्यों से जुड़े होने का कोई इतिहास नहीं है । किसी भी वीडियो रिकॉर्डिंग में उसके द्वारा राष्ट्रविरोधी नारे लगाए जाने की बात सामने नहीं आई है । नौ फ़रवरी की रात को वास्तव में क्या हुआ था, इसका पता एक वस्तुपरक जाँच के माध्यम से लगाया जाना चाहिए ताकि किसी निर्दोष का उत्पीड़न न हो और वास्तविक षड्यंत्रकारियों का पर्दाफ़ाश हो । कन्हैया कुमार का अपना पक्ष भी सामने आने दिया चाहिए ताकि जनता को पूर्ण सत्य ज्ञात हो सके । फ़िलहाल तो जनसामान्य को पुलिस, राजनेताओं तथा मीडिया के परस्पर-विरोधी वक्तव्य भ्रमित ही कर रहे हैं ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

श्री बिष्ट जी जो भी भ्रष्ट नेता है उनकी निंदा होती है लेकिन केजरी वाल ने अपनी राजनीति भ्रष्टाचार विरोध से शुरू की थी मतदाता ने ख़ास क्र पढ़े लिखे वर्ग ने उन्हें जम कर वोट दिया था जिन्होंने कभी वोट नहीं दिया था वः भी घरों से वोट के लिए निकले थे आम गरीब मतदाता इस बात पर वोट देता हैं उन्हें क्या मिल रहा हे अब यह हालत है राज मिल गया परन्तु सिवाय हर वक्त विरोध के कुछ काम नहीं सबसे बड़ी बात जिसको यह इमानदार कह दें व्ही ईमानदार हैं दिल्ली में कहीं कुछ नहीं बदला केवल सुबह सारे समर्थकों को कह दिया जाता हैं आज का विषय यह है सब व्ही बोलते हैं वह किसी का प्रयुत्तर नहीं सुनते अब तो लोग जैसे ही महोदय स्क्रीन पर आते हैं चैनल बदल देते हैं यह जनता का पैसा सबसे अधिक विज्ञापन पर करते हैं

के द्वारा: Shobha Shobha

आदरणीय एस एल बिष्ट जी, सादर अभिवादन! एक लेखक पत्रकार वही होता है जो निष्पक्ष भाव से लिखता है गलतियों को उजागर करता है. मुझे आपका विचार बहुत पसंद आया ... केजरीवाल जनसुलभ हैं और जल्दी किसी पर कड़ा एक्शन नहीं लेते हैं हो सकता है यह भी उनकी रणनीति का हिस्सा हो. पर लोगों की क्षुद्र मानसिकता का पता तो चल ही जाता है. सम विषम सूत्र की सफलता से अधिकांश लोग उत्साहित हैं और इसे दूसरे शेरोन में और दिल्ली में फिर से अपनाने की बात हो रही है. राजनीतिक विरोधी विरोध करेंगे पर यह भी तपकर और निखरता जा रहा है. एक सफल राजनीतिज्ञ की तरह हर चाल को बड़ी सावधानी पूर्वक रख रहा है. भाजपा के लिए यह एक अरोध तो है ही इसलिए विरोध सबसे ज्यादा कर रहे हैं. आपकी लेखनी और सोच को नमन!... सादर!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

पूरी तरह सहमत हूँ बिष्ट जी आपसे । जैसे अनुभव यमुना जी को हुए हैं, वैसे ही मुझे भी हुए हैं । सामूहिक वार्तालापों में सिद्धांतों और नैतिक मूल्यों की महिमा का बखान करने पर अकसर मुझे उपहास का ही सामना करना पड़ा है । जिन देशों ने अपने चरित्र को बनाए रखा, उन्होंने राजनीतिक स्वतन्त्रता पाने के उपरांत उस चरित्र-बल से ही सफलता के नए-नए शिखर छुए । जबकि हमने स्वतंत्र होने के उपरांत पाया तो न जाने क्या, लेकिन चरित्र जैसी अनमोल वस्तु को खो देने में कोई विशेष देर नहीं लगाई । हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि धन गया तो समझो कुछ नहीं गया, स्वास्थ्य गया तो समझो कुछ गया और चरित्र गया तो समझो सब कुछ चला गया । जब हम भारतीय अपना चरित्र ही खो बैठे हैं तो बचा क्या ? ऐसे में देश में चलाया गया प्रत्येक अभियान अपने लक्ष्य तक पहुँचना तो दूर प्रथम चरण पर ही दम तोड़ देने को अभिशप्त ही रहेगा चाहे वह लक्ष्य कितना ही पवित्र क्यों न हो । जहाँ तक क़ानूनों का प्रश्न है, जब कानून के रखवाले उनका पालन करवाने में कोई रुचि न लेकर उन्हें दुधारू गाय की भांति भ्रष्ट आय का साधन ही समझते हों, तो उनका घोषित उद्देश्य कैसे पूरा हो सकता है ? सौ में से निन्यानवे बेईमान, फिर भी मेरा भारत महान ! 

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

पूरी तरह सहमत हूँ बिष्ट जी आपसे । खुली गुंडागर्दी और आतंक के माध्यम से अपनी ही घरों से निकाल बाहर किए गए और अपने ही देश में शरणार्थी बना दिए गए कश्मीरी पंडितों की व्यथा सुनने वाला कोई भी दृष्टिगोचर नहीं होता है । कला के क्षेत्र से जुड़े हुए लोग भी इनकी आवाज़ नहीं बनते हैं । ले-देकर एक हिन्दी फ़िल्म 'शीन' 2004 में बनी थी जो इनके दर्द को बयां करती थी । अशोक पंडित ने उसे बनाया था जो स्वयं एक भुक्तभोगी कश्मीरी पंडित हैं । वह फिल्म भी अधिक चर्चित या सफल नहीं हुई थी जबकि उसमें प्रमुख भूमिका समाजवादी विचारधारा के सांसद और अभिनेता राज बब्बर ने निभाई थी । मेरा मत स्पष्ट है - जब हमारा देश और इसका संविधान सेक्यूलर है तो इसमें ऐसे किसी भी राज्य के लिए जगह नहीं होनी चाहिए जो केवल एक ही धर्म के लोगों के लिए हो । यदि कश्मीर में कश्मीरी पंडितों या अन्य ग़ैर-मुस्लिमों के लिए जगह नहीं है तो ऐसे कश्मीर की सेक्यूलर और उदार भारत को कोई आवश्यकता नहीं है । कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास के बिना कश्मीर से जुड़े किसी भी बिन्दु पर बात अधूरी है, निरर्थक है । इस विषय को अपने लेख के माध्यम से उठाने के लिए बहुत-बहुत साधुवाद आपको ।

के द्वारा:

के द्वारा: एल.एस. बिष्ट् एल.एस. बिष्ट्

के द्वारा: एल.एस. बिष्ट् एल.एस. बिष्ट्

"अभी तो सिर्फ खाते पीते मुस्लिम वर्ग को यहां असहिष्णुता दिखाई दे रही है । मुस्लिम समुदाय का वह वर्ग जो सामाजिक रूप से सबसे ज्यादा सुरक्षित है तथा जिसकी समाज मे एक अलग पहचान भी है वह बेवजह की असुरक्षा की बात कह कर माहौल को खराब करने लगा है । आमीर से पहले शाहरूख खान ने भी इसी तरह नकारात्मक विचार प्रकट किये थे । जिसकी काफी आलोचना हुई थी । लेकिन अगर इस प्रकार के प्रयासों पर अंकुश न लगाया गया तो वह समय दूर नही जब यही भाषा यहां जातीय वर्गों मे भी बोले जाने लगेगी । यह सबकुछ इसलिए हो रहा है क्योंकि सम्प्रदाय व जातीय समूहों को भय दिखा कर वोट के सौदागर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं ।" आदरणीय विष्ट जी ! सौ प्रतिशत आपने सही बात लिखी है ! सच कहने के लिए बहुत बहुत हार्दिक बधाई !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

श्री बिष्ट जी बहुत अच्छा लेख चीन अपने यहां के जिंगियाँन प्रदेश में किसी को सिर नही उठाने देता वहीं पर इनकी ( मु ०)) जनसंख्या का बहुत बड़ा भाग रहता है वहां डिक्टेटर शिप है जापान ने बहुत पहले ही अपने यहां बहुत बड़ा भाग निकाल दिया था अत : उनका सिर दर्द नहीं है फिर भी चीन दुनिया के साथ चलने की कोशिश कर रहा हैं |जरूरत तो इस बात की है कि इस्लाम को मानने वाले स्वयं आगे आयें और इस दानव की काली छाया से इस्लाम को मुक्त करें और दुनिया को बतांये कि यह मजहब किसी भी रूप मे हिंसा की इजाजत नही देता सही लिखा है आपने एक बार फिर से लिख रही हूँ बहुत अच्छा विचार पूर्ण लेख |भारत का उलेमा वर्ग समझाने की कोशिश कर रहा है अपनी जवान जैनरेशन को बचाने की कोशिश कर रहा है |

के द्वारा: Shobha Shobha

"कभी इंदिरा गांधी जी की दबंगई के चलते उनके अगूंठे के नीचे रहने वाले कांग्रेसी जिन्हे इमरजेंसी की याद होगी मोदी जी पर तानाशाही का आरोप लगा रहे हैं । वामपंथी जिनकी खुद की जमीन इतनी कम हो गई है कि खडे रहने के लिए भी कोई ठौर नही मिल रहा मोदी जी के जनाधार कम होने का दावा कर रहे हैं । मुंबई के फिल्मी हीरो व फिल्मकार जिनकी नंगई ने हमारे बच्चों के संस्कार बिगाड दिये और बच्चों के साथ साथ बैठ कर फिल्म देखना मुश्किल कर दिया है वह लोग देश के माहौल खराब होने की बात कर रहे हैं ।" आदरणीय एल.एस. बिष्ट् जी ! बहुत खूब ! क्या खूब सच्चाई आपने बयान की है ! इनकी बोलती बंद करने वाली है ! मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिये !

के द्वारा:

श्री बिष्ट जी आपके लेख को पढ़ कर पुरानी बातें याद आ गई सिनेमा देखना कितना सस्ता था हमारे मेरठ मे निशात सिनेमा घर था उसकी बालकनी केवल महिलाओं के लिए थी हम सब जब पहुँचते थे बाहर खड़े होने के बजाए बाकलनी में बैठा देते थे यदि सीट फुल हैं सीढ़ी में बैठ जाते थे पहले फिल्म का आखिर देखते थे फिर फिल्म शुरू से | दिल्ली में घर के पास का सिनेमा घर अब बंद हो गया है बालकनी की टिकट होती थी यदि हॉल भरा हुआ है फिर भी टिकट मिल जाती थी किसी को भी बालकनी से उठा कर मेरे और मेरे पति के लिए सीट खाली करा दी जाती थी अपने घर से जो चाहे खाने के लिए ले जाओ कोई रोक नहीं अब तो बरसों गुजर गये सिनेमा गयेसिनेमा देखने का शौक भी खत्म हो गया |

के द्वारा: Shobha Shobha

सच तो यह है कि दिल्ली मे दम तोडते मरीजों की अकाल मौतों के लिए डेंगू से ज्यादा जिम्मेदार है हमारी भ्र्ष्ट, लाचार, बेबस और उदासीन व्यवस्था | आज विकास और समृध्दि के तमाम हमारे दावे कटघरे मे खडे हैं | आखिर हम बुलैट ट्रेन और स्मार्ट सिटी के सपने कैसे देख सकते हैं जब एक मच्छर हमे लाचार और बेबस कर देता है | जरूरी है कि हमारे हुक्मरान इन सवालों से मुंह न चुराते हुए उन बुनियादी कारणों को समझें जो हमारी इस हालत के लिए जिम्मेदार हैं | - सवाल तो उठना लाजिमी है ऊपर से राजनीति ऐसे ही मुद्दे पर की जाती है सभी एक दूसरे पर जिम्मेवारी थोप खुद को बचा लेना चाहते हैं. सफाई ब्यवस्था/ स्वच्छता अभियान की भी पोल दिल्ली में ही खुल जाती है बाकी जगहों की की बात करें. हाँ २०२२ तक जंगल में भी पेड़ों पर बल्ब जरूर जलेंगे. सबक अपना घर भी होगा, भारत दूसरों को राह दिखायेगा. हाँ चपरासी पद के लिए २३ लाख आवेदन भी आएंगे जिनमे अधिकांश उच्च शिक्षा प्राप्त होंगे.

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: rameshagarwal rameshagarwal

के द्वारा: aksaditya aksaditya

सत्य है , आज महिला सशक्तिकरण के नाम पर इस का उसी तरह दुरुपयोग हो रहा है या हो सकता है जैसे हमाकरे उत्तर प्रदेश मे एससी/एसटी एक्ट का होता रहा है - वोट बैंक की खातिर संभिधान के मूल भूत सिद्धांत को ही समाप्त कर दिया गया - समानता और बराबरी का अधिकार यह कैसे हुआ की एक को तो चलने को दिया जेट बीमान और दूसरे को बैसाखी ? अभी एक नेता ने कामसूत्र के विज्ञापन पर ऐतराज जताया तो उसे माफी मागनी पड़ी जबकि वह विज्ञापन अश्लीलता के अतिरिक्त कुछ नहीं पर अश्लीलता पर अंकुश लगाने के स्थान पर उस नेता पर ही अंकुश लगाया गया , क्यूँ ? कभी कभी मुझे लगता है की आज हम जिस दुनिया मे रह रहें है उस मे जिस की लाठी उस की भैंस का राज्य है और कुछ नहीं ।

के द्वारा:

यह वह मूल्य हैं जो उपभोक्ता संस्कृति से उपजे हैं । और जिनका नशा सर चढ कर बोलता है और अंतत: उस मोड पर आकर खत्म हो जाता है जहां जिंदगी अपना अर्थ खो देती है । दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है कि इस अंधेरे का घेरा हमारी जिंदगी मे कसता ही जा रहा है । हम इससे मुक्त हो सकेंगे या नही, यही एक बडा सवाल है । न चाहते हुए भी सभी चैनेल दिन रात इसी कहानी के पीछे भागते नजर आ रहे हैं. मुझे तो यह कहानी एक सीरियल से ज्यादा कुछ नहीं लगती क्यों सारे चैनेल इसे भुनाने में लगे हैं. पत्रकार रवीश कुमार अँधेरे में जीते ४- ६ हजार प्रति महीने कमाने वाले मजदूर के घरों में घुसकर रिपोर्टिंग करते नजर आते है. मजदूर यूनियन हड़ताल और बंद करते फिरते हैं ...मोदी जी रामचरित मानस, गीता और योग का ज्ञान दुनिया को बता रहे हैं...पर क्या फायदा?... सादर!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

सियारों की तरह सामुहिक आवाजें निकाल कर इन्होनें जिस सामाजिक परिवेश को तैयार किया है, आज उसका नतीजा दिखाई देने लगा है | ऐसा नही है कि महिला कानूनों का दुरूपयोग नही हो रहा लेकिन वहां बोलने का जोखिम कोई नही उठाना चाहता | बस जयकारे तक सारी सोच सीमित है |----------ज्वलंत मुद्दों पर सटीक शब्दों की धार से अपनी बात रखना एक सच्चे लेखक की खुसूसियत होती है,और वो आप में है आदरणीय बिष्ट जी |दरसल ये निपट स्वार्थ नीति है फिर चाहे वो तिल का ताड बनाते न्यूज चैनल हों या ब्यान देते नेता हों,या आरक्षण की आग फ़ैलाने वाले संगठन हों ,मेरे विचार से इसे राजनीती कहना राजनीती का अपमान होगा ,राज नीति अब देखने को नहीं मिलती | सामयिक आलेख ,सादर .

के द्वारा: Nirmala Singh Gaur Nirmala Singh Gaur

श्री बिष्ट जी आप तक प्रतिक्रिया पहुंच रही है इस लिए अपने विचार लिख रही हूँ वाकई आज कल विज्ञापन का जमाना है किसी प्रसिद्ध अभिनेता द्वारा कुछ भी बेचा जा सकता है बच्चों को बर्बाद करने के लिए सब कुछ है मेरी काम वाली का बच्चा दूध इसलिए नहीं पिता मम्मी बोर्नवीटा नही लाती बजार मैं जिस विज्ञापन का ज्यादा आकर्षण हैं व्ही लोग खरीदते हैं विज्ञापन के लिए मोटी रकम दी जाती है बिलकुल सटीक बात "यह भी महसूस किया जाने लगा है कि नैतिकता से परे तमाम विज्ञापन हमारे सामाजिक ताने बाने को ही छिन्न भिन्न करने लगे हैं | समाज को ऐसी दौड मे शामिल किया जा रहा है जहां मानवीय मूल्यों व सामाजिक सरोकारों के लिए कोई जगह नही बचती |" बहुत अच्छा लेख

के द्वारा: Shobha Shobha

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

के द्वारा: एल.एस. बिष्ट् एल.एस. बिष्ट्

आदरणीय एल.एस. बिष्ट् जी ! हार्दिक अभिनन्दन ! सबसे पहले तो आपके ब्लॉग की स्पेस बढ़ने की बधाई ! जागरण परिवार ने देर से ही सही, परन्तु आपका अनुरोध स्वीकार किया, इसके लिए उन्हें बहुत बहुत धन्यवाद ! होली से अबतक आपके सभी लेखों को पढ़ने का अवसर मिला, परन्तु कई कई बार भेजने पर भी प्रतिक्रिया जा ही नहीं रही थी ! किसी भी ब्लॉग पर कमेंट नहीं जाने से कुछ लिखने कि भी इच्छा नहीं हो रही थी ! आपके सभी लेख अच्छे लगे ! इस लेख में आपने सही कहा है कि आप पार्टी में आज हर कोई अपने को ही तुर्रम खां समझ रहा है और दूसरे को कम आंक रहा है । ये लोग अहंकार रूपी भयंकर बीमारी से ग्रस्त हो चुके हैं ! सादर प्रेम और शुभकामनाओं सहित !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

आदरणीय एल.एस. बिष्ट् जी ! हार्दिक अभिनन्दन ! सबसे पहले तो आपके ब्लॉग की स्पेस बढ़ने की बधाई ! जागरण परिवार ने देर से ही सही, परन्तु आपका अनुरोध स्वीकार किया, इसके लिए उन्हें बहुत बहुत धन्यवाद ! होली से अबतक आपके सभी लेखों को पढ़ने का अवसर मिला, परन्तु कई कई बार भेजने पर भी प्रतिक्रिया जा ही नहीं रही थी ! किसी भी ब्लॉग पर कमेंट नहीं जाने से कुछ लिखने कि भी इच्छा नहीं हो रही थी ! आपके सभी लेख अच्छे लगे ! इस लेख में आपने सही कहा है कि आप पार्टी में आज हर कोई अपने को ही तुर्रम खां समझ रहा है और दूसरे को कम आंक रहा है । ये लोग अहंकार रूपी भयंकर बीमारी से ग्रस्त हो चुके हैं ! सादर प्रेम और शुभकामनाओं सहित !

के द्वारा:

आदरणीय इस एल बिष्ट साहब, सादर अभिवादन! आपने बिहार का पूरा इतिहास भूगोल को खंगालने की कोशिश की है. आपको स्मरण होना चाहिए कि नीतीश कुमार को मुख्य मंत्री बनाने की भाजपा की नीति जातीय समीकरण को ही साधना था. पिछड़ों के नेता लालू को पछाड़ने के लिए नितीश की जरूर थी क्योंकि यह भी पिछड़े वर्ग से ही आते हैं. नीतीश ने दलित और महादलित का राग अलापा था और महादलित ही उनके गले की हड्डी बन गया है. पर भाजपा यानी अमित शाह और मोदी की रणनीति मांझी को फोड़ने के लिए चली गयी कूटनीति है. अगर मांझी भाजपा के साथ जाते हैं या भाजपा मांझी का समर्थन करती है तो मेरी जानकारी के अनुसार भाजपा ने दिल्ली की हार से कुछ सबक नहीं लिया है. वैसे थोड़ी ऊहापोह अभी है... केसरीनाथ त्रिपाठी भी भाजपा समर्थित राजयपाल है. दिल्ली के लेफ्टनेंट गवर्नर अपनी भूल से सबक लिया या नहीं त्रिपाठी जी भी समझते होंगे... वैसे जनता भाजपा को ही सत्ता में लाना चाहेगी तो कौन रोक सकेगा ...पर वहां भी सुशील मोदी पिछड़े तबके का ही नेता हैं. नन्द किशोर यादव उनके चालाक बन सकते हैं...गिरिनाथ सिंह भी अपनी मूंछों पर ताव दे रहे हैं...जहाँ तक मेरी समझ है......आदरणीय

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: एल.एस. बिष्ट् एल.एस. बिष्ट्

के द्वारा: एल.एस. बिष्ट् एल.एस. बिष्ट्

श्री संतोष कुमार जी, हार्दिक धन्यावाद आप्ने लेख पढ कर अपने विचारों से अवगत कराया । मोदी जी के बारे मे हमारी भी यही राय है । एक लंबे अरसे के बाद देश को एक अच्छा प्रधानमत्री मिला है जो दिल से देश के लिए कुछ करना चाहता है । उनकी कार्य संस्कृर्‍ति को देख कर यह विश्वास और भी मजबूत हो रहा है । उर्जावान , इमानदार और देश हित के लिए समर्पित ऐसा व्यक्ति देश को मिला है यह देश का सोभाग्य है । जहां तक चुनावी अनुमानों का सवाल है तो यह बदलता रहता है । मोदी जी दूसरे दलों के वे लोग जो कल तक आलोचना कर रहे थे उन्हें उदारता के साथ शामिल करने की गलती न करें । यह लोग सिर्फ सत्ता के लिए पार्टी मे आ रहे हैं ।मेरे हिसाब से यह देश का सबसे अच्छा समय साबित होगा । आपने समय निकाल कर लेख पढा व संवाद स्थापित किया इसके लिए आपका हार्दिक आभार ।

के द्वारा: एल.एस. बिष्ट् एल.एस. बिष्ट्

आदरणीय विष्ट जी ,...सादर प्रणाम ! सटीक सुन्दर लेख के लिये हार्दिक बधाई ,....आपका निष्पक्ष आकलन बिलकुल सही लगता है ,... सही कड़े फैसलों का नकारात्मक प्रभाव भी हो सकता है ,...लेकिन यह कमजोर और अल्पजीवी होता है !....अंतिम परिणाम सत्य भावना के पक्ष में ही जाता है ,....... निश्चित परिणाम तो समय ही बता सकता है ,..हमें उसकी प्रतीक्षा करनी ही होगी ....फिलहाल मोदी जी की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है ,....उनमें मानवसेवा का भाव भावना निर्दोष है ,..ये उनके वाणी व्यवहार कर्म से साफ़ दिखता है ,...ये निर्दोषता उनको बनाए रखनी होगी !......हमने उनको अपना आशा दीप बनाया है ,......ये जलता रहेगा जब तक पूरा तेल बाती होगा ...जिसकी उनमें कदापि कमी नहीं लगती ,..वो बहुत कर्मठ ऊर्जावान दीप्त योगी हैं ,......लौ नित्य बढ़ती जा रही है !,........महान मानव समुदाय बहुत धैर्यवान आशावान है ,..... आपके अनुमान के विपरीत जाने के लिए क्षमा चाहूँगा ,.......मैं दिल्ली चुनाव में भाजपा को बड़े भारी बहुमत से जीतता हुआ देखता हूँ ,.....हर दरवाजे प्रचार संवाद करके आम आदमी पार्टी भाजपा को कड़ी टक्कर देने की स्थिति में आ सकती थी ,...अरविन्द जी का माफ़ी मांगने का अंदाज भी लुभावना था ,.......लेकिन अच्छे चुस्त शासन के सुन्दर सार्थक प्रभावी सन्देश ने भाजपा को भारी बढ़त दिला दी है ,....टूटने वालों से कई गुना ज्यादा जरूर जुड़े होंगे ,.......किरण बेदी जी के आने से विजय और प्रचंड हो जायेगी !....बहुत अच्छे योग्य कर्मठ लोग भाजपा से जुड़ रहे हैं ,....कुछ ऐरे गैरे भी आ रहे हैं जिसमें सतर्कता भी जरूरी है ,...झारखंड चुनाव और बड़े बहुमत से जीता जा सकता था ,...आशा करते हैं कि बिहार उत्तर प्रदेश में गलती नहीं दोहराएंगे ,.....भाजपा समर्थ सच्चे हाथों में है ,.....बार बार गलती करना हम मूरखों का काम है !.......दिल्ली भारत का दिल है ,...यहाँ से निकला सन्देश बहुत दूर तक प्रभाव दिखायेगा ,......मोदीजी के हाथ में हम सुरक्षित भारत देख रहे हैं ,.......बहरहाल हमेशा की तरह भारी दुष्प्रचार भी जारी है ,.......अरविन्द केजरीवाल पर अंडे टमाटर फेंकने और गलत तरीकों से विरोध करने करवाने वालों पर कार्यवाही जरूरी है ,....ये अवश्य ही कांग्रेसी करतूत होगी !...भले फायदा आम आदमी पार्टी का हो !......अपने कुकर्मों से डूब चुके लोग किसी भी तरह से मोदी को कमजोर कर कुछ उबरना चाहेंगे !....लेकिन कोई नापाक मंसूबा कामयाब नहीं होगा !....गलत करने वालों को उसका फल अवश्य ही मिलेगा !.... मंच से बहुत लम्बी अनुपस्थिति के लिए सभी नए पुराने गुरुजनों मित्रों से क्षमा मांगता हूँ ,.....विश्वास है कि आप सभी पुनः ह्रदय से क्षमा करेंगे !........ जल्दी नियमित होने के विश्वास के साथ आप सभी का हार्दिक अभिनन्दन !... पुनः सादर प्रणाम

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

आदरणीय विष्ट जी ,...सादर प्रणाम ! सटीक सुन्दर लेख के लिये हार्दिक बधाई ,....आपका निष्पक्ष आकलन बिलकुल सही लगता है ,... सही कड़े फैसलों का नकारात्मक प्रभाव भी हो सकता है ,...लेकिन यह कमजोर और अल्पजीवी होता है !....अंतिम परिणाम सत्य भावना के पक्ष में ही जाता है ,....... निश्चित परिणाम तो समय ही बता सकता है ,..हमें उसकी प्रतीक्षा करनी ही होगी ....फिलहाल मोदी जी की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है ,....उनमें मानवसेवा देशसेवा का भाव भावना निर्दोष है ,..ये उनके वाणी व्यवहार कर्म से साफ़ दिखता है ,...ये निर्दोषता उनको बनाए रखनी होगी !......हमने उनको अपना आशा दीप बनाया है ,......ये जलता रहेगा जब तक पूरा तेल बाती होगा ...जिसकी उनमें कदापि कमी नहीं लगती ,..वो बहुत कर्मठ ऊर्जावान दीप्त योगी हैं ,......लौ नित्य बढ़ती जा रही है !,........महान मानव समुदाय बहुत धैर्यवान आशावान है ,..... आपके अनुमान के विपरीत जाने के लिए क्षमा चाहूँगा ,.......मैं दिल्ली चुनाव में भाजपा को बड़े भारी बहुमत से जीतता हुआ देखता हूँ ,.....हर दरवाजे प्रचार संवाद करके आम आदमी पार्टी भाजपा को कड़ी टक्कर देने की स्थिति में आ सकती थी ,...अरविन्द जी का माफ़ी मांगने का अंदाज भी लुभावना था ,.......लेकिन अच्छे चुस्त शासन के सुन्दर सार्थक प्रभावी सन्देश ने भाजपा को भारी बढ़त दिला दी है ,....टूटने वालों से कई गुना ज्यादा जरूर जुड़े होंगे ,.......किरण बेदी जी के आने से विजय और प्रचंड हो जायेगी !....बहुत अच्छे योग्य कर्मठ लोग भाजपा से जुड़ रहे हैं ,...सही भावना का अभिनन्दन होना ही चाहिए ,.....कुछ ऐरे गैरे भी आ रहे हैं जिसमें सतर्कता भी जरूरी है ,...झारखंड चुनाव और बड़े बहुमत से जीता जा सकता था ,...आशा करते हैं कि बिहार उत्तर प्रदेश में गलती नहीं दोहराएंगे ,.....भाजपा समर्थ सच्चे हाथों में है ,.....बार बार गलती करना हम मूरखों का काम है !.......दिल्ली भारत का दिल है ,...यहाँ से निकला सन्देश बहुत दूर तक प्रभाव दिखायेगा ,......मोदीजी के हाथ में हम सुरक्षित भारत देख रहे हैं ,.......बहरहाल हमेशा की तरह भारी दुष्प्रचार भी जारी है ,.......अरविन्द केजरीवाल पर अंडे टमाटर फेंकने और गलत तरीकों से विरोध करने करवाने वालों पर कार्यवाही जरूरी है ,....ये कांग्रेसी करतूत भी हो सकती है !...भले फायदा आम आदमी पार्टी का हो !......अपने कुकर्मों से डूब चुके लोग किसी भी तरह से मोदीजी को कमजोर कर कुछ उबरना चाहेंगे !....लेकिन कोई नापाक मंसूबा कामयाब नहीं होगा !....गलत करने वालों को उसका कुफल अवश्य ही मिलेगा !.... मंच से बहुत लम्बी अनुपस्थिति के लिए सभी नए पुराने गुरुजनों मित्रों से क्षमा मांगता हूँ ,.....विश्वास है कि आप सभी पुनः ह्रदय से क्षमा करेंगे !........ जल्दी नियमित होने के विश्वास के साथ आप सभी का हार्दिक अभिनन्दन !... पुनः सादर प्रणाम

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

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के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

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सही अर्थों मे अवध की नृत्यकला को जो शोहरत हासिल हुई, वह यहां की नाचने गानेवाली वेश्याओं के कारण ही मिली | पूरे देश में यहां की नर्तकियों का कोई सानी नहीं था | बताते हैं ल्खनऊ की तवायफ़ गौहरबाई ने अवध के बाहर दूर-दूर तक बहुत नाम कमाया | नजाकत व प्रणय का भाव जैसे यहां की नर्तकियां अभिव्यक्त करती थीं, वैसा अन्यत्र कहीं नहीं था | बहुत अच्छा लेख ! पूरा लेख बहुत रोचक और ज्ञानवर्धक लगा ! मंच पर इस पुरानी,परन्तु सदा प्रासंगिक और नवीन रहने वाली प्रस्तुति के लिए हार्दिक आभार ! वास्तव में ये एक अमर कृति बन चुकी है और डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाकर टीवी पर दिखाने लायक है ! लखनऊ महोत्सव के अवसर पर इसका प्रकाशित होना बहुत महत्वपूर्ण है !

के द्वारा: sadguruji sadguruji