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मेरे सपनों..संघर्षों...बिखराव-टूटन व जुडने की अनवरत यात्रा..एक अनजाने , अनदेखे क्षितिज की ओर ।

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शहरों से रूठा हुआ सावन

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girl on Jula

वसंत के बाद अगर किसी के स्वागत के लिए पलकें बिछाई जाती हैं तो वह है सावन । कौन ऐसा अभागा होगा जिसका सावनी फुहारों मे मन मयूर नृत्य करने के लिए मचलने न लगे । तपती हुई दोपहरियों और आग बरसाते सूर्य देवता के ताडंव के बाद् सावन की रिमझिम फुहारें मन को शीतलता प्रदान कर जो उमंगें भरती हैं उसके वर्णन मे हमारे कवियों और शायरों ने न जाने कितनी स्याही उडेली है । लेकिन यह सावन है जिसकी मदहोशी , महिमा और उल्लास का कोई छोर ही नजर नही आता ।
यही तो सावन है जिसके लिए नायिका अपने नायक को उलाहने देने मे भी नही चूकती और कह उठती है – ‘ तेरी दो टकिया की नौकरी मे मेरा लाखों का सावन जाए………’  । सच भी है सावन की इस मस्ती के आगे सभी रंग फीके हैं । ऐसे मे नौकरी की क्या हैसियत कि वह नायिका के सावनी आमत्रंण को नकार सके ।
भीगी हुई धरती से निकली सोंधी महक जब हवाओं के रथ पर सवार होकर , शोर मचाते, गली – गली, गांव-गांव अपने आने का संदेश देती है तभी तो अपने पिया के इंतजार मे बैठी कोई नवयौवना कह उठती है ” सावन का महीना पवन करे शोर………” और यही शोर ही तो है कि उसका मन-मयूर नाच उठता है ।
पेडों की झुरमुटों के बीच से खिलखिलाती युवतियों के कजरी गीत माहौल मे एक अलग ही रंग घोल देते हैं और मौसम के बदलते चक्र को न समझने वाला भी कह उठता है – ” पड गये झूले सावन रितु आई रे………” । लेकिन सावनी कजरी गीतों का यह रिश्ता झूलों का ही मोहताज नही । खेतों मे धान की रोपाई करती युवतियां भी इन गीतों के सुरीली लय से फिजा मे एक अलग ही रस घोल देती हैं ।
लेकिन अब बदलते जमाने के साथ सावन का यह पारंपरिक चेहरा भी तेजी से बदलने लगा है । पेडों की डालियों मे झूलों की संख्या साल-दर-साल कम होती जा रही है । शहरों मे पली बढी गांव की इन नवयौवनाओं का भला कजरी गीतों से क्या रिश्ता । खेतों मे धान की रोपाई भी अब मजदूरों का काम बन कर रह गया है । ऐसे मे खेतों मे गीतों की वह तान कहां ।
लेकिन फिर भी हमारे ग्रामीण जीवन मे सावन आज भी एक उत्सव की तरह आता है और सभी को अपने रंग मे सराबोर कर देता है । अपने मायके मे सखी-सहेलियों से बतियाने का इंतजार करती यौवनाओं को आज भी सावन का इंतजार रहता है ।
लेकिन यही सावन मानो शहरों से रूठ सा गया हो । कंक्रीट के जंगल के बीच न ही खेत रहे और न ही वह पेड जिनकी डालों पर झूले डाले जा सकें । आधुनिकता ने हरियाली को भी डस लिया है । ऐसे मे बेचारा सावन यहां मानो मन मसोस कर रह जाता है । शहरों से रूठे इस सावन को कभी हम दोबारा बुला सकेंगे, कह पाना मुश्किल है । लेकिन फिर भी उसकी भीगी-भीगी फिजा मे घुली मदहोसी बता ही देती है कि देखो सावन आ गया ।

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nishamittal के द्वारा
August 8, 2015

सटीक पोस्ट सावन पर मेरा कमेंट जाता नहीं और मेरी पोस्ट पर आये हुए कमेंट भी स्पैम में जाते हैं

nishamittal के द्वारा
August 8, 2015

सटीक पोस्ट, मेरा कमेंट जाता नहीं कारण ज्ञात नहीं

Shobha के द्वारा
August 8, 2015

श्री बिष्ट जी जुगादी वृक्षों को बोनसाई बना के ड्राइंग रूम में सजा दिया सडकों के किनारे वृक्ष लगे थे उनको काट दिया उनकी जगह सजावटी पेड़ लगा दिए बारिश कहाँ से होगी

sadguruji के द्वारा
August 12, 2015

आदरणीय विष्ट जी ! बहुत खूब ! आपकी लेखनी को सलाम ! मुझे भी अपने बचपन में साथियों के संग झूला झूलने की मधुर याद आ गई ! सादर आभार !


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