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समान नागरिक संहिता पर इतना शोर क्यों

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वोट बैंक की राजनीति के चलते जिस धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुस्लिम तुष्टिकरण का राजनीतिक खेल खेला जा रहा था उसका बिगडेल चेहरा अब सतह पर स्पष्ट दिखाई देने लगा है । बहुसंख्यक हिंदुओं ने देश व समाज हित मे बनाये गये कानूनों पर कभी कोई संदेह नही किया । लेकिन अब जब बात समान नागरिक संहिता की उठ रही है तो कुछ मुस्लिम धर्मगुरूओं को उच्चतम न्यायालय से लेकर सरकार तक की नियत मे खोट दिखाई देने लगा है । यहां तक कि मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने साफ कर दिया है कि वह एक देश एक कानून को नही मानेगा । बोर्ड और अन्य मुस्लिम संगठनों ने भी समान नागरिक संहिता का विरोध कर विधि आयोग की प्रशनावली का बायकाट करने का एलान किया है ।

बोर्ड के महासचिव मोहम्मद वली रहमानी तो दो कदम आगे चल कर प्रधानमंत्री मोदी को सलाह देते नजर आ रहे हैं कि वह पहले दुश्मनों से निपटें । घर के अंदर दुश्मन न बनाए । यह हाल तब है जब देश की शीर्ष अदालत के निर्देश पर सरकार ने विधि आयोग को महज राय जानने का काम सौंपा है ।

देश मे समान नागरिक संहिता की बात एक लंबे अरसे से महसूस की जा रही थी । लेकिन इसके लिए अनुकूल सामाजिक परिवेश न होने के कारण इसे ठंडे बस्ते मे रखना ही बेहतर समझा गया । लेकिन इधर मुस्लिम समाज मे तलाक के तरीकों को लेकर इस समाज के अंदर से ही आवाजें उठने लगीं और तलाक के बाद महिलाओं की दयनीय हालातों को देख कर उच्चतम न्यायालय को सरकार से पूछ्ना पडा कि वह समान नागरिक कानूनों की दिशा मे क्या सोच रही है । लेकिन इतने भर से सियासी घमासान शुरू हो गया । मुस्लिम धर्मगूरूओं व मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड् से जुडे लोगों को इसमें अपनी धार्मिक स्वतंत्रता खतरे मे पडती दिखाई देन लगी । हास्यास्पद तर्क तो यहां तक दिये जा रहे हैं कि एक कानून के चलते भारत की विविधता ही खत्म हो जायेगी ।

लेकिन सच यह है कि मुस्लिम समाज के कुछ लोग अपने वर्चस्व को बनाये रखना चाहते हैं । उनके विरोध के पीछे मुख्य कारण उनके अपने स्वार्थ है जिन पर वह धर्म व परंपरा का लबादा डाल कर लोगों को विरोध के लिए उकसाने की कोशिशों मे लगे हैं । जब कि वास्तविकता यह है कि यही धार्मिक परंपराएं आज उनके विकास मे सबसे बडी बाधक बन कर खडी हैं ।

देखा जाए तो इसमें इतना उग्र व विचलित होने की आवश्यकता ही नही है । यह तो सिर्फ राय जानने की एक कोशिश भर है और उसके लिए कुछ सवालों की एक प्रशनावली है जिस पर लोगों से सुझाव मांगे गये हैं । गौरतलब यह भी है इस प्रशनावली के सवाल सिर्फ मुस्लिम समुदाय से ही नही बल्कि हिंदु व ईसाई समुदाय से भी संबधित हैं । लेकिन विरोध के स्वर सिर्फ मुस्लिम धर्मगुरूओं व कुछ संगठनों से ही उठ रहे हैं । इसी मे एक अहम सवाल है कि क्या तीन तलाक की प्रथा को रद्द किया जाना चाहिए ? या कुछ बदलाव अथवा इसी रूप मे बरकरार रखा जाए ? इसी तरह बहु विवाह के संबध मे भी राय जानने की कोशिश की गई है । यही नही हिंदु महिलाओं की संपत्ति के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाये जाने चाहिए इसमे भी विचार मांगे गये हैं । इसी तरह तलाक के लिए ईसाई महिलाओं को दो साल के इंतजार पर भी पूछा गया है कि क्या यह दो वर्ष का समय इन महिलाओं के समानता के अधिकार को प्रभावित करता है ? इसी तरह कुछ और सवाल हैं । लेकिन सारा शोर और विरोध मुस्लिम समा ज के सवालों को लेकर है । आखिर ऐसा क्यों ?

नि:संदेह यह एक अच्छा कदम है और विशेष कर यह देखते ह्ये कि कुछ समुदायों मे धर्म व परंपराओं के नाम पर महिलाओं के साथ अन्याय हो रहा है । लेकिन धर्मगुरूओं की अपने हितों और वर्चस्व बनाये रखने की राजनीति के चलते एक बेवजह का शोर सुनाई देने लगा है । आग मे घी का काम वह राजनीतिक दल भी कर रहे हैं जो सेक्यूलर राजनीति का लबादा ओढ अपने वोट बैंक की राजनीतिक रोटियां लंबे समय से सेंक रहे हैं । जबकि सच यह है कि सेक्यूलर राजनीति के इन झंडाबरदारों को मुस्लिम समाज की बदहाली से कभी कोई लेना देना रहा ही नही । ऐसा होता तो वह इन प्रगतिशील कदमों का कुतर्कों के माध्यम से विरोध कदापि न करते ।

बहरहाल धर्म व वोट की राजनीति करने वालों को यह जानना जरूरी है कि हमारे संविधान मे भी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता की बात कही गई है । इसे राज्य के नीति निदेशक तत्वों मे शामिल किया गया है जैसा कि कई और अन्य बातों को । लेकिन यह दीगर बार है कि अभी तक इस दिशा की ओर कभी गंभीरता से सोचा ही नही गया था । न्यायालय के माध्य्म से ही सही यह एक सराहनीय प्रयास है जिसे संकीर्ण धार्मिक भावनाओं से ऊपर उठ कर देखा समझा जाना चाहिए ।

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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
October 18, 2016

आदरणीय विष्ट जी ! ‘बेस्ट ब्लॉगर आफ दी वीक’ चुने जाने पर हार्दिक अभिनन्दन और बहुत बहुत बधाई ! समान नागरिक संहिता के मुद्दे पर आपने बहुत अच्छा लिखा है ! वोटों के लालच में हमारे देश के तथाकथित सेकुलर नेताओं ने अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण कर कर के उन्हें इतना सिर चढ़ा लिया है कि अब वो केंद्र सरकार और उच्चतम न्यायालय दोनों की ही कोई अच्छी बात भी सुनने को तैयार नहीं हैं ! बहुत सार्थक और पठनीय प्रस्तुति हेतु सादर आभार !

Jitendra Mathur के द्वारा
October 19, 2016

आदरणीय बिष्ट जी । बहुत-बहुत बधाई हो आपको साप्ताहिक सम्मान के लिए । आपका लेख सामयिक है और इसमें निहित विचारों से असहमत होने की कोई गुंजाइश नहीं । लेकिन बिष्ट जी, अब हालात वो नहीं रहे जो दशकों तक रहे हैं । अब मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति करने वाले दल भी इस मुद्दे पर कठमुल्लों का साथ देने से परहेज़ कर रहे हैं जो किसी भी लिहाज़ से भारतीय मुस्लिम समाज के हितों का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं । मुस्लिम महिलाएं स्वयं जागरूक होकर अपने हितों के संवर्धन के लिए उठ खड़ी हुई हैं । अब यह शोर वे ही लोग मचा रहे हैं जिनको अपना अस्तित्व तथा अपनी प्रासंगिकता संकट में दिखाई पड़ रही है । सामान्य मुस्लिम समाज के अधिसंख्य पुरुष भी अब महिलाओं को उनका उचित अधिकार देना चाहते हैं तथा घर तोड़ने वाली एवं महिलाओं के साथ अन्याय करने वाली प्रथाओं का समर्थन नहीं करते हैं ।

ashasahay के द्वारा
October 20, 2016

आपने बहुत सही आकलन किया है स्थितियों का श्री बिष्ट जी।अपने घर के अन्दरके विरोध का सारा श्रेय विरोधियों को ही मिलना चा हिए नकि सरकार को। साप्ताहिक सम्मान के लिए बहुत बधाई।

atul61 के द्वारा
October 20, 2016

सही बात है कि धर्मगुरुओं और मुसलिम लॉ बोर्ड से जुड़े लोगों को अपना अस्तित्व खतरे में लग रहा है और राजनेताओं को सत्ता हथियाने के लिए कुछ भी करने में गुरेज़ नहीं है I दोनों में से किसी को भी सामाजिक सुधार में दिलचस्पी नहीं है I पदासीन राजनेताओं को मतदाता को जवाब देने के लिए कुछ न कुछ कार्य करना पड़ता है और अपने किये हुए कार्यों का ढोल पीटने से वोह भी नहीं बच सकते क्योंकि सत्ता छूटने का डर सताता रहता है Iभारत के  लोकतंत्र में सामाजिक अव्यवस्थाओं का बोलबाला बढ़ रहा है I बहुत सारी बिगड़ी हुयी व्यवस्थाएं बहुसंख्यक समाज में भी हैं या पनप रही हैं I उदाहरण के लिए मध्यम वर्ग में बढ़ते तलाक I सादर अभिवादन सहित अतुल

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
October 20, 2016

सादर अभिवादन सदगूरू जी । सही कहा है आपने कि अब तो यह हालत हो गई है वो केन्द्र सरकार व उच्चतम न्यायालय को भी सुनने को तैयार नही दर-असल इसके लिए भी हमारी तुष्टिकरण की राजनीति ही जिम्मेदार है । अभी तो यह शुरूआत है ।

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
October 20, 2016

अभिवादन जितेन्द्र माथुर जी । सही कहा है आपने कि इसके विरोध मे वे लोग ज्यादा है जो मुस्लिम राजनीति कर रहे हैं या कठमुल्ले किसम के लोग । वैसे एक हिस्सा मुस्लिम महिलाओं का भी अपनी आजादी का पक्षधर है । उन्हें भी खुली हवा चाहिए । देखिए अब आगे होता है क्या ।

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
October 20, 2016

आदरणीय आशा सहाय जी सादर अभिवादन व हार्दिक धन्यवाद आपने समान नागरिक संहिता पर लिखे मेरे ब्लाग को पढने के लिए अपना कीमती समय निकाला । वाकई देश के अंदर ही कुछ ऐसे तत्व पैदा हो गये हैं जिन्हें देशविरोधी कहा जाना चाहिए । यह अच्छे कामों के भी विरोधी बन रहे हैं । बहरहाल ऐसा भी ज्यादा दिन तक नही चलेगा । सादर ।

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
October 20, 2016

आदरणीय अतुल जी सादर धन्यावाद । आपने सही कहा कि …..” भारत के लोकतंत्र में सामाजिक अव्यवस्थाओं का बोलबाला बढ़ रहा है ” वाकई यह हालात चिंताजनक हैं । इस पर गहराई से चिंतन की आवशयकता है । कहीं न कहीं हमारे विकास के ढाचे और आधुनिकता के स्वरूप मे कोई गंभीर दोष है । बढते तलाक, आत्महत्यायें, हत्याये , बलात्कार , बढता अवसाद यह सब हमे एक दिन अपनी गिरफ्त मे ले लेगा । समय रहते इस पर सोचा जाना चाहिए । सादर, सप्रेम

Shobha के द्वारा
October 21, 2016

श्री बिष्ट जी मुस्लिम संगठन विरोध की राजनीति ही करते रहेंगे महिलाओं को अधिकार देने की सोच भी नहीं सकते सरकार अबकी बार कठोर कदम उठाने पर आमादा है बस महिलाओं को हिम्मत से खड़ा होना पड़ेगा आपको उत्तम लेख के लिए बहुत बधाई

rameshagarwal के द्वारा
October 22, 2016

जय श्री राम विष्ट जी बहुत सुन्दर लेख मुस्लिम तुष्टीकरण के कारन सेकुलर दाल कांग्रेस जद((यू)केजरीवाल ममता सब समर्थन में आ गए बेंगाल में तीन तलाक के पक्ष में प्रदर्शन किया ये नेता देश को बेच दे कुर्सी के लिए.मुस्लिम समाज इसी लिए पिछड़ा है अफ़सोस ज्यादातर मुस्लिम नेता इसके पक्ष में आ गए बहुत गलत लेकिन वे कैग रहते भारत में पर खुद को संविधान से भी ऊंचा समझते.लेकिन उम्मीद है की इस बार कोर्ट कड़ा फैसला लेगी.

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
October 25, 2016

सादर अभिवादन श्री रमेश अग्रवाल जी और बहुत बहुत धन्यावाद आपने हमेशा की तरह मेरे ब्लाग को अपना अमूल्य समय दिया । सही कहा है आपने मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के कारण यह सब हो रहा है । कुछ राजनीतिक दल तो वोट के लिए किसी भी हद तक जा सकते है । लेकिन लगता है इस बार तलाक के मामले मे कुछ नया जरूर होगा । मोदी जी ने बडी साफगोही से इसे खत्म करने के पक्ष मे बात कही है । एक ब्डा मुस्लिम महिलाओं का वर्ग भी इस तीन तलाक से मुक्त होना चाहता है ।


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