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मेरे सपनों..संघर्षों...बिखराव-टूटन व जुडने की अनवरत यात्रा..एक अनजाने , अनदेखे क्षितिज की ओर ।

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कहीं हम भी खडे हैं कटघरे मे

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मौजूदा समय मे देश दो बडी समस्याओं से जूझ रहा है । एक तरफ देश मे बढता भ्र्ष्टाचार है तो दूसरी तरफ बढता प्रदूषण  । ऐसा भी नही कि इन्हें गंभीरता से नही लिया गया । सरकारी स्तर पर प्रयास भी किये गये । लेकिन कुल मिला कर वही ढाक के तीन पात । अभी हाल मे सर्द मौसम की शुरूआत मे जिस तरह से दिल्ली मे सांस लेना दूभर हो गया था और लोगों को पूरी दिल्ली एक गैस चैम्बर मे रूप मे नजर आने लगी थी , उसने पूरे देश का ध्यान इस ओर खींचा । सिर्फ दिल्ली ही नही उत्तर प्रदेश , पंजाब, हरियाणा मे भी कई स्थानों मे यही हालात बने । लेकिन आम प्रचलित भारतीय त्रासदी यह है कि हालात थोडा ठीक हो जाने पर सबकुछ भुला दिया जाता है ।
कुछ ऐसी ही कहानी है देश मे बढते भ्र्ष्टाचार की । आजादी के कुछ समय बाद लगभग सत्तर के दशक से ही भ्र्ष्टाचार पर बातें की जाने लगी थीं । देश मे बढते राजनीतिक भ्र्ष्टाचार के साथ नौकरशाही के भ्रष्टाचार पर भी संसद के अंदर व बाहर चर्चायें व बहस शुरू हो चुकी थी । लेकिन इधर हाल के वर्षों मे देश की अर्थव्यवस्था को जिस प्रकार काले धन के व्यापक प्रसार ने चोट पहुंचाई उसने सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया । लेकिन त्रासदी यह रही कि काले धन व बढते प्रदुषण पर  बातें तो बहुत की जाने लगीं लेकिन ठोस और प्रभावी सार्थक प्रयासों के अभाव मे हालात जस के तस बने रहे ।
इधर  पूरी दुनिया मे बिगडते प्रर्यावरण को लेकर  जो गहरी चिंता जाहिर की गई उसने भारत जैसे सोये हुए देश को भी जगाने का काम किया । फलस्वरूप  प्रर्यावरण को बचाने के लिए कुछ ठोस प्रयासों की शुरूआत भी की गई लेकिन यहां तो हर कुंए मे भांग पडी थी  । सामाजिक हित वाले इन प्रयासों के संदर्भ मे जब हमने  समाज की ओर देखा तो यहां एक आत्मकेन्द्रित, स्वार्थपूर्ण समाज ही दिखाई दिया  । जिसे देश मे लोगों को समाज  हित से ज्यादा अपने हित सुहाते हों    वहां  अच्छे प्रयासों की अकाल मौत का होना कोई अचरज की बात नही ।
सामाजिक  हित के लिए किये गये  तमाम प्रयासों मे  शायद ही आशातीत परिणाम मिले हों । बढते प्रदूषण को रोकने के लिए प्लास्टिक के उपयोग पर रोक लगाने के प्रयास किये गये । थोडे समय के लिए कुछ अच्छे संकेत मिले भी लेकिन बहुत जल्द सबकुछ भुला दिया गया । बाजारों व दुकानों मे तथा दैनिक उपयोग मे प्लास्टिक की पन्नियों का धडल्ले से उपयोग आज भी जारी है । चुनाव प्रचार मे भी प्लास्टिक से बनी सामग्री का उपयोग बद्स्तूर जारी है । इसी तरह सार्वजनिक स्थलों मे ध्रुमपाम न करने के लिए कानून बनाया गया । इसके लिए दंड का भी प्राविधान है लेकिन लचर क्रियांवयन के चलते यह भी बस एक कानून बन कर रह गया है । लोगों को सार्वजनिक स्थलों पर ध्रुमपान करते देखा जा सकता है । तंबाकू गुटका पर रोक लगाई गई लेकिन कानून को बाई पास करके आज भी लोग धडल्ले से उसका उपयोग कर रहे हैं । बस फर्क यह है कि तम्बाकू पाउच  और सादे  मसाले के पाउच को अलग  अलग करके बेचा जा रहा है ।
अब रही बात देश को स्वच्छ रखने की तो वह देश साफ सुथरे रह सकते हैं  जहां के नागरिक कूडेदान न मिलने पर केले का छिलका या पैकेट का रेपर अपनी जेब मे डालना बेहतर समझते हैं बजाय इसके कि उसे सडक पर फेंक दें । आज हम जिन यूरोपीय देशों के अनुसरण करने की बात करते हैं वहां की बेहतरी मे कानून से ज्यादा नागरिकों के ‘ सिविक सेंस ‘ की भूमिका महत्वपूर्ण है ।  लेकिन यहां तो अपना कूडा पडोसी के घर के सामने डाल देने मात्र से ही सफाई का कर्तव्य पूरा हो जाता है । बाकी सफाई तो बहुत दूर की बात है । अब ऐसे मे कैसे पूरा हो स्वच्छ भारत का सपना । चार दिन का तमाशा करना एक अलग बात है ।
प्रदूषण से ज्यादा जहां दिखावे की प्रवत्ति सोच मे प्रभावी हो तथा कार एक स्टेटस सिम्बल हो और रिश्तेदारों को दिखाने की चीज हो वहां सडकों पर कारों की संख्या को सीमित किया जा सकेगा, मुश्किल ही लगता है ।
हमारी स्वार्थी मानसिकता का नजारा आजकल बैकों के बाहर भी देखा जा सकता है । काले धन को लेकर सरकार ने 500 व 1000 रूपये के नोट बंद करके एक साहसिक फैसला लिया । जनता को परेशानी न हो इसलिए इन नोटो के बदले नये नोटो को बदलने की सुविधा भी प्रदान की और साथ ही किसी भी सीमा तक बैंक मे पुराने नोटों को जमा करने की सुविधा भी । लेकिन जल्दी ही इन सुविधाओं मे हमारी स्वार्थी सोच का ग्रहण लगना शुरू हो गया । ‘ ईमानदार ‘ कहे जाने वाले लोगों ने कमीशन लेकर अपनी पहचान पर ( आई. डी ) काले कारोबारियों के काले पैसों को नये नोटों से बदलना शुरू कर दिया ।
यही नही  कई ने तो बहती गंगा मे हाथ धोते हुए अपने खातों मे भ्र्ष्टाचारियों के पैसे भी जमा करने का काम बखूबी शुरू कर दिया । यानी जिन काले धन धारकों के विरूध्द यह मुहिम शूरू की गई थी पैसे लेकर उनकी ही मदद की जाने लगी । तुर्रा यह कि यही लोग यह कहते नही थक रहे कि मोदी सरकार ने बहुत अच्छा काम किया है । यह ईमानदारी की एक अलग किस्म है जो अब दिखाई दे रही है ।
दर-असल देखा जाए तो  आजादी के बाद से ही  हमें वह संस्कार ही नही मिले जिनसे राष्ट्रहित हमारी सोच मे सर्वोपरि होता  । जिन देशों का  अनुसरण करने का प्र्यास किया जा रहा है वहां लोगों को राष्ट्र्भक्ति , राष्ट्रहित व सामाजिक सरोकार जन्म से ही  घुट्टी मे पिलाये गये हैं । यहां तो विकास और समृध्दि को जो दिशा दी गई उसमें इन विचारों का कोई स्थान ही नही है । भारतीय समाज मे  आत्मकेन्द्रित खुशहाली की सोच के बीच भला राष्ट्रहित से किसी को  क्या मतलब ।

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rameshagarwal के द्वारा
November 16, 2016

जय श्री राम बिष्ट जी जहाँ जहाँ अंग्रेजो ने राज्य करने के बाद आजदी दी वहा के देशो का यही हॉल कई गुलामी ने हमारे इम्मान को बेच दिया इसके बाद कांग्रेस सरकार को सख्ती नहीं करनी चाइये हालत बिगड़े चले गए आज देश वाशियो को सिविक सेंस गायब हो गया हम लोग बाँध दंड कोइ काम नहीं करते न काम करते न ही देश और समाज हित में सोचते.हमारी शिक्षा भी दूषित हो गयी.अब तो डंडे के बल पर ही काम चलेगा.जनता से ज्यादा नेता परेशान है भगवान् ही देश को बचाए.सुन्दर भावनाओं सहित लेख.

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
November 17, 2016

आदरणीय रमेश अग्रवाल जी सादर अभिवादन , हार्दिक आभार । आपके विचारों से पूरी तरह सहमत । स्वार्तपरता व चाटुकारिता की संस्कृति उस दौर से ही विकसित होने लगी थी । रही सही कसर पूरी हो गई आजादी के बाद । देश प्रेम के वह संस्कार मिले ही नही जिनकी जरूरत थी । नेता से लेकर आम आदमी बस अपने बारे मे ही सोचने लगा । आज वही दिख रहा है ।


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