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मेरे सपनों..संघर्षों...बिखराव-टूटन व जुडने की अनवरत यात्रा..एक अनजाने , अनदेखे क्षितिज की ओर ।

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रूठा हुआ सावन

Posted On 6 Jul, 2017 Social Issues में

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वसंत के बाद अगर किसी के स्वागत के लिए पलकें बिछाई जाती हैं तो वह है सावन । कौन ऐसा अभागा होगा जिसका सावनी फुहारों मे मन मयूर नृत्य करने के लिए मचलने न लगे । तपती हुई दोपहरियों और आग बरसाते सूर्य देवता के ताडंव के बाद् सावन की रिमझिम फुहारें मन को शीतलता प्रदान कर जो उमंगें भरती हैं उसके वर्णन मे हमारे कवियों और शायरों ने न जाने कितनी स्याही उडेली है । लेकिन यह सावन है जिसकी मदहोशी , महिमा और उल्लास का कोई छोर ही नजर नही आता ।

यही तो सावन है जिसके लिए नायिका अपने नायक को उलाहने देने मे भी नही चूकती और कह उठती है – ‘ तेरी दो टकिया की नौकरी मे मेरा लाखों का सावन जाए………’  । सच भी है सावन की इस मस्ती के आगे सभी रंग फीके हैं । ऐसे मे नौकरी की क्या हैसियत कि वह नायिका के सावनी आमत्रंण को नकार सके ।

भीगी हुई धरती से निकली सोंधी महक जब हवाओं के रथ पर सवार होकर , शोर मचाते, गली – गली, गांव-गांव अपने आने का संदेश देती है तभी तो अपने पिया के इंतजार मे बैठी कोई नवयौवना कह उठती है ” सावन का महीना पवन करे शोर………” और यही शोर ही तो है कि उसका मन-मयूर नाच उठता है ।

पेडों की झुरमुटों के बीच से खिलखिलाती युवतियों के कजरी गीत माहौल मे एक अलग ही रंग घोल देते हैं और मौसम के बदलते चक्र को न समझने वाला भी कह उठता है – ” पड गये झूले सावन रितु आई रे………” । लेकिन सावनी कजरी गीतों का यह रिश्ता झूलों का ही मोहताज नही । खेतों मे धान की रोपाई करती युवतियां भी इन गीतों के सुरीली लय से फिजा मे एक अलग ही रस घोल देती हैं ।

लेकिन अब बदलते जमाने के साथ सावन का यह पारंपरिक चेहरा भी तेजी से बदलने लगा है । पेडों की डालियों मे झूलों की संख्या साल-दर-साल कम होती जा रही है । शहरों मे पली बढी गांव की इन नवयौवनाओं का भला कजरी गीतों से क्या रिश्ता । खेतों मे धान की रोपाई भी अब मजदूरों का काम बन कर रह गया है । ऐसे मे खेतों मे गीतों की वह तान कहां ।

लेकिन फिर भी हमारे ग्रामीण जीवन मे सावन आज भी एक उत्सव की तरह आता है और सभी को अपने रंग मे सराबोर कर देता है । अपने मायके मे सखी-सहेलियों से बतियाने का इंतजार करती यौवनाओं को आज भी सावन का इंतजार रहता है ।

लेकिन यही सावन मानो शहरों से रूठ सा गया हो । कंक्रीट के जंगल के बीच न ही खेत रहे और न ही वह पेड जिनकी डालों पर झूले डाले जा सकें । आधुनिकता ने हरियाली को भी डस लिया है । ऐसे मे बेचारा सावन यहां मानो मन मसोस कर रह जाता है । शहरों से रूठे इस सावन को कभी हम दोबारा बुला सकेंगे, कह पाना मुश्किल है । लेकिन फिर भी उसकी भीगी-भीगी फिजा मे घुली मदहोसी बता ही देती है कि देखो सावन आ गया ।

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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
July 7, 2017

 श्री बिष्ट जी आज कल सावन बाढ़ गलियों में कीचड़ भरा रहता है शहरों में लोगों ने नालियाँ पाट कर अपने घर को एक मीटर आगे कर लिया बरसात की फुहारे आसमान से बरसती अच्छी लगती हैं धरती पर य़ मेरी बेटी की नन्हीं बेटी बरसात के दिनों में इंडिया आई यहाँ सडकें पानी से भरी थीं वह ख़ुशी से चीखी रिवर आन रोड

jlsingh के द्वारा
July 8, 2017

मेरी बेटी की नन्हीं बेटी बरसात के दिनों में इंडिया आई यहाँ सडकें पानी से भरी थीं वह ख़ुशी से चीखी रिवर आन रोड… अभी रात्रि के तीन बजकर २०मिनट हो रहे हैं और मैं ाकी इस पंक्ति को पढ़कर हांसे बिना नहीं रह सका. आदरणीय शोभा जी आप कमाल की लेखिका हैं! सादर!

jlsingh के द्वारा
July 8, 2017

आदरणीय बिष्ट साहब, सादर अभिवादन! आप सावन की बूंदों पर भी लिखते हैं मुझे नहीं मालूम था. वैसे मानस में वर्षा का विशेष प्रसंग है इसमें भगवन श्री राम भी कहते हैं – घन घमंड नभ गर्जत घोरा, प्रिय हीं तरपत मन मोरा. बरसात के बिना जीवन संभव नहीं. भारतीय कृषि पूर्णत: वर्षा जल पर आधारित है. दुःख की बात है की हम अभीतक वर्षा जल का प्रबंधन सही ढंग से नहीं कर पा रहे हैं. मौसम का आनंद लेना ही चाइये… पद गए झूले सावन ऋतू आये रे. कल मालिनी अवस्थी का मेघदूत नृत्य संगीत देख रहा था आजतक पर मन भावविभोर हो गया, इधर आपने मन्त्र मुघ्ध कर दिया. सादर!

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
July 10, 2017

आदरणीय जवाहर जी सादर अभिवादन । सावन पर लिखे फीचर के लिए आपने जो उत्साहवर्धन किया उसके लिए आभारी हूं । दर-असल; एक दौर मे फीचर लेखन ही मेरी प्रमुख विधा रही है । तब प्रिंट मीडिया का दौर था । अब तो क्या छ्प रहा है समझ मे ही नही आता । स्व. राजेन्द्र माथुर साहब ने जब मैं नभाटा के लिए लिखा करता था उन्होने मुझे फीचर लिखने की सलाह दी थि । तब से मैं बराबर फीचर लिखता रहा हूं । सादर , सप्रेम

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
July 10, 2017

सादर धन्यावाद शोभा जी । वाकई सडकों मे भरा पानी व कीचड सावन का आनंद कम कर देते हैं । ऐसा न हो तो सावनी फुहारों का आनंद दोगुना हो जाए ।

yamunapathak के द्वारा
July 11, 2017

आदरणीय बिष्ट जी बहुत सुन्दर ब्लॉग है आदरणीया शोभा जी की टिप्पणी रिवर ऑन रोड बहुत सटीक लगी .बच्चे सच्चे होते हैं . साभार

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
July 11, 2017

आदरणीय यमुना पाठक जी , सादर अभिवादन | अच्छा लगा आपने सावन पर लिखे मेरे फीचर को समय निकाल कर पढ़ा और सराहा ? टहे दिल से शुक्रिया | उम्मीद है आपका यह सहयोग भाव हमेशा बना रहेगा |


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